Friday, January 16, 2009

sex story in hindi

कई बार सपने में मैं अपनी प्रीति भाभी को उनकी तारीफ में कहता था .." भाभी आप बहुत खूबसूरत हो आपके रसीले होठो का रस पीने के लिए कोई भी मर्द चाहेगा गोल गोल बड़ी आँखों में अजीब सी उलझन है आपकी पतली कमर देख कर कोई भी छूने को चाहेगा काजोल की जैसे बड़ी बड़ी चुचियां है आपकी दो मोटे कूल्हों को देखकर हर कोई दीवाना हो जाएगा सच कहूं भाभी आप एक हसींन हिरोइन जैसे दिखती हो." वो मुस्कुरा कर कहती हैं-"बस बस बहुत तारीफ करते हो वो भी झूठी " ये क्या कहा आपने मैं भी कुर्बान जाऊं आप पर अगर झूठा निकला तो।
भैया को अक्सर शहर से बाहर जाना पड़ता है। एक बार भाभी ने काले रंग की साड़ी और ब्लाऊज पहना। भाभी गोरी हैं इसिलिए मैंने उसकी खूब तारीफ की और कहा - भाभी आप तो काले कपड़ो में बहुत ही खूबसूरत दिखाती हो वो मुस्कुरा के बोली झूठे कहीं के।
फिर कई दिनों तक मन में एक सपना सजाता रहा कि कब भाभी को पा लूं और कस के उनकी गरम नरम चूत में अपना मोटा लन्ड डाल के उन्हें चीखने पर मज़बूर कर दूं।
एक दिन भैया ने सुबह जल्दी बाहर जाना था और मैंने उन्हें स्टेशन तक छोड़ने जाना था। मैं केवल अंडरवीयर पहने कसरत कर रहा था कि अचानक भाभी आ गई। मुझे एक झटका सा लगा और मैंने एकदम अपनी कमर पर एक तौलिया लपेट लिया। भाभी मेरे पास आईं और बोली- देवर जी ! आपकी बोडी तो बहुत जानदार है। मेरी बाजू पकड़ कर कहा- क्या सख्त बाजू है। मेर लन्ड भाभी के नर्म हाथों का स्पर्श पाते ही मचलने लगा। भाभी ने तौलिये में मेरे लन्ड को फ़ूलते हुए देख लिया। फ़िर वो जल्दी से बोली - जल्दी तैयार हो जाओ, चलो तुम्हारे भैया राह देख रहे हैं, उनकी गाड़ी का वक्त हो रहा है। वो चली गई पर मेरा लन्ड गर्म हो चुका था। मैं भैया को स्टेशन छोड़ आया और फ़िर कालेज चला गया।
शाम को जब घर आया तो भाभी पड़ोस में गप्पें हान्क रही थी। मुझे देख कर वो अन्दर आ गई। आज उन्होंने गहरे नीले रंग का गाऊन पहन रखा था और अन्दर आ कर दरवाजा बंद करते ही उन्होंने कहा - क्यों देवर जी मैं काले कपडों में सुंदर लगती हूँ ना !
मैंने कहा - हाँ. तो उन्होंने मैं कैसी दिखती हू इन काले कपड़ो में ?
मैंने हँसते हुए कहा - भाभी तुमने तो नीले रंग का गाऊन पहना है.
उन्होंने शरारत से कहा उस दिन तो कहते थे भाभी तुम काली साड़ी और काले ब्लाऊज में अप्सरा लगती हो. आज क्या हुआ ? मैंने कहा - लेकिन भाभी आपने नीला गाऊन पहना हुआ है काला नहीं.
तभी मेरा ध्यान भाभी के कंधे पर दिख रहे ब्रा स्ट्रैप पर गया। मैंने आगे बढ कर ब्रा स्ट्रैप के नीचे उंगली डाल कर ऊपर को उठाया और कहा- अच्छा तो ये है काले रंग की ब्रा। लेकिन दिख तो नहीं रही, भाभी जरा दिखाओ ना।
" कुछ नहीं ! कुछ नहीं ! मैं तो मज़ाक कर रही थी "भाभी बोली।
मैंने कहा- भाभी प्लीज! दिखाओ ना ! प्लीज भाभी प्लीज ! बस एक झलक एक बार !
इतना सुनते ही भाभी ने अपना गाऊन निकल दिया मैं उसे देखते ही दंग रह गया सच भाभी काले रंग की चोटी सी ब्रा और काले रंग की बिल्कुल छोटी सी पैन्टी में थी। उसकी दोनों चूचियां आधी से ज्यादा नंगी थी जब पैन्टी उसकी आधी चूत को ही ढक पा रही थी दोनों ओर से चूत नंगी दिखाई दे रही थी ये नजारा देख कर मेरा लंड अंडरवियर में खड़ा होने लगा.
भाभी ने कहा ” उस दिन तो बड़ी तारीफ करते थे आज क्या हो गया ”. मैंने कहा “भाभी तुम्हारी चूचियां और चूत का कोई जवाब मेरे पास नहीं पहली बार किसी औरत का आधा बदन नंगा देखा है सच कह रहा हूँ तुम्हारी कसम भाभी इतनी खूबसूरत गदराई हुई जवानी पहली बार देख कर मैं बाग बाग हो गया हूँ ”
ये कहते हुए मैंने आगे कदम बढाया तो भाभी हिली नहीं अपनी जगह से. मैंने भाभी को कंधो से पकड़ कर अपने से चिपटा लिया। उन्होंने मुझसे कहा “ क्या कर रहे हो, पहले अन्दर चलो ”.
मै समझ गया कि आज भाभी दावत दे रही हैं। अन्दर जाते ही मैंने अपनी शर्ट निकल दी ,ऊपर का बदन नंगा हो गया फिर बिना सोचे अपनी पैंट उतार दी सिर्फ़ अंडरवियर में आ गया मेरी नजर भाभी की चुचियों पर गई छोटी सी ब्रा और बड़े कद की चूचियां कब तक छुपाती. मैंने पीछे जा के हूक खोल दी। दो नंगे फल भाभी के बदन पर झूलने लगे .वो कसमसाई मैंने उनकी बिना परवाह किए पैंटी को एक ही झटके में उतार दी और अपना अंडरवियर को निकाल दिया.उन्होंने नकली गुस्से से कहा .. ये क्या कर रहे हो.
मैंने कुछ सुना नहीं मैंने अपनी बाहों में नंगी भाभी के जिस्म को दबोच लिया वो कराहने लगी की मैने दोनों होठो को उसके रसीले होठो पर रख दिए और जी भर के उसका रस पान करने लगा एक हाथ से चुचियों को दबाता मसलता रहा दूसरे हाथ से उसका जिस्म पूरा कस के मेरे जिस्म से चिपकाया ये सब अचानक हो जाने से वो हाथ पाँव मारने लगी लेकिन उसका कुछ न चला ओर मैं भाभी के जिस्म को बुरी तरह रौंदने लगा होठो के बीच जीभ डाल के मैंने उसे बुरी तरह चूमा उसके मुह में .. आह्ह्ह उफ़. .मोनू .. मैं तुम्हारी भाभी हूँ .. ये ग़लत है .. छोड़ दो मुझे ..जग गगग ..की आवाज निकलने लगी पर मैं पूरी तरह से उनकी भरी भरी चूचियों को दबाता रहा उसकी कड़ी निप्पल को दो उंगली के बीच ले के मसलने लगा भाभी अब सिस्कारियां भरने लगी ..नही .. प्लिज्ज़ ..उईई ईई …. धीरे ..मोनू ऊउऊ ..लेकिन अब उसका विरोध ख़तम हो गया था.
हम दोनों की सांसे तेज होने लगी मैंने जम कर भाभी के पूरे बदन को बेतहाशा चूमा .. .. मेरे होंठ उसके बदन पर फिसलने लगे .. एकदम गोरा और चिकना बदन था .अभी तक मैंने उसकी चूत पर हाथ नहीं लगाया था .. वो दोनों जांघो को सिकोड़े हुए थी .. मेरे हाथ और होंठो के स्पर्श से वो … ऐसी आवाजे निकलने लगी थी. प्रीति भाभी अब मीठी मीठी आहें भरने लगी मेरी ध्यान अब उसके पेट से होते हुए गहरी नाभि पर गया मैंने वहां सहलाया तो उन्होंने सिहर कर अपनी जांघे खोल दी और अब मेरी नजर उन की चूत पर पड़ी मैं झूम उठा एक भी बाल नहीं था गुलाबी रंग की चूत के बीच में एक लाल रंग का होल दिखाई दिया ये देख कर मुह में पानी आ गया.
भाभी के जिस्म को चारो ओर से चूमने सहलाने और दबाने के बाद चूचियों को प्यार से मुंह में लेकर कई बार चूसा भाभी का अंग अंग महक ने लगा उसकी दोनों चूचियां कड़ी ओर बड़ी हो गई उसके लाल लाल निप्प्ल उठ कर खड़े हो गए तीर की तरह नुकीले लग रहे थे. तब मेरी भाभी मुझसे जोर से लिपट गई। दो बदन एक दूसरे से रगड़ने लगे मेरी सांसे फूलने लगी हम दोनों तेजी से अपने मकसद की ओर आगे बढ़ने लग॥ १० मिनट तक हम दोनों ने एक दूसरे को पूरा चूमा सहलाया। भाभी ने पहली बार शरमाते शरमाते लंड को पकड़ा तो बदन में बिजली सी दौड़ गई पहली बार मैंने कहा “मेरी जान उसके साथ खेलो शरमाओ मत अब हम दोनों में शर्म कैसी .”
मेरा बदन बहुत ही गरमा चुका था तब मैंने भाभी को फर्श पर लिटा दिया ओर उसके ऊपर आके जोर से चुचियों को फिर से दबाया पर बाद में मैंने चूत की तरफ़ देखा. चूत तो पूरी गीली थी. उसमे से जूस ऐसे निकल रहा था जैसे नल से पानी बह रहा हो. अब मैंने भाभी के पावों को चौडा किया तो उनकी फूली हुयी गुलाबी चूत पूरी तरह दिखने लगी .भाभी की गुलाबी चूत को देख कर मैंने कहा “भाभी सच बहुत ही चिकनी है तेरी ये चूत बिना बाल की गोरी उभरी हुई। दिल कर रहा है इसे खा जाऊं ” इतना कह कर मैं उसकी चूत पर झुका और चूत के होठों को अपने होठों से चूमने लगा।
भाभी तो जैसे उछल पड़ी। ओह आ मोनू ………॥अऽऽऽ ये क्या कर रहे हो…ऐसा तो तुम्हारे भैया भी नहीं करते कभी.. ओह मुझे अजीब सा लग रहा है। भाभी की सिस्कारियों से पूरा कमरा गूंजने लगा। मैं बड़े प्यार से भाभी की चूत को चूसता, चूमता चाटता रहा। वो अपने होठों पर जीभ फ़ेर रही थी और मचल रही थी कि अचानक चिल्लाई- मोनू छोड़ मुझे… आहऽऽमेरा हो रहा है…जोर से…कहते हुए मेरा सिर अपनी जान्घों में दबा लिया और मेरे बाल खींचने लगी। …भाभी ने आह ऽऽ भरते हुए जल्दी जल्दी तीन चार झटके पूरे जोरों से अपने चूतड़ उठा कर मारे। मैंने फ़िर भी उनको नहीं छोड़ा और अपनी जीभ से उनकी चूत से बहने वाले रस को चाट गया।
वो कह रही थी- अब हट जाओ मोनू, अब सहन नहीं हो रहा। अब अपनी प्यारी भाभी को चोदो। फ़ाड़ दो मेरी चूत को अपनी भाभी की चूत में घुस जाओ। मैं पहले से जानती थी कि तुम मुझे चोदना चाह्ते हो, मैं भी तुम से चुदना चाहती थीअब मैं भी भाभी की चूत का स्वाद अपने लौड़े को चखाना चाहता था। मैं भाभी के ऊपर आया तो भाभी ने सिर उठा कर मेरे लौड़े कि तरफ़ देखा। उन्होने कहा- देवरजी ! मैं तो मर जाऊंगी इतने मोटे और लम्बे से।
मैंने पूछा किस मोटे और लम्बे से?
वो शरमाते हुए बोली तुम्हारे लो ऽऽऽ लौड़े से !
मैंने कहा-कुछ नहीं होगा… और भाभी की टांगें चौड़ी की तो उनकी चूत के होंट ऐसे खुल गये जैसे किसी फ़ाइव स्टार होटल के दरवाजे अपने आप खुल जाते हैं किसी के आने पर। मैंने अपनी दो अंगुलियों से चूत को थोड़ा और खोला और अपना लन्ड का सिर उस पूरे खिले गुलाब के फ़ूल में रख दिया। भाभी ने कहा - थोड़ा अन्दर तो करो !
मैने कहा- अभी करता हूं। यह कह कर मै अपना लौड़ा धीरे धीरे बाहर ही रगड़ने लगा। भाभी बेचैन हो उठी। वो अपने चूतड़ ऊपर को उठा उठा कर लौड़े को अपनी चूत में डलवाने की कोशिश कर रही थी। मैं उनको तड़फ़ाते हुए उनकी सारी कोशिशें नाकाम कर दिए जा रहा था।
"अब डालो ना !" भाभी बोली।
"क्या डालूं… और कहां …" मैंने भाभी से पूछा।
"अच्छा बताऊं तुझे? बहनचोद ! अपनी भाभी की चूत में अपना लौड़ा डाल और चोद साले ! भाभी तड़फ़ते हुए बोली।
भाभी के मुंह से ऐसी गालियां सुन कर मैं हैरान रह गया।
तभी भाभी ने एक ऐसा झटका दिया ऊपर की तरफ़ अपने चूतड़ों को कि एक बार में ही मेरा पूरा का पूरा लौड़ा भाभी की चूत की गहराई में उतर गया। भाभी के मुख से निकला- आह हय-मार दिया ! एक दर्द मिश्रित आनन्द भरी चीख !
अब मैं भाभी के ऊपर गिर सा गया और उनको हिलने का मौका ना देकर उनके होंट अपने होंटों से बंद कर दिये और अपने चूतड़ ऊपर उठा कर एक जोर का धक्का मारा तो भाभी फ़िर तड़प गई।
इसके बाद तो बस आऽऽह्…आऽऽह्…आऽऽह्…आऽऽह्…आऽऽह्… आऽऽह्…आऽऽह्…आऽऽह्…आऽऽह्…धीरे…आऽऽह्…आऽऽह्…आऽऽह्…आऽऽह्… आऽऽह्…आऽऽह्…आऽऽह्…आऽऽह्…आऽऽह्…आऽऽह्…रुक जरा … हां… आऽऽह्…आऽऽह्…आऽऽह्…जोर से… आऽऽह्…आऽऽह्…आऽऽह्…हांऽऽअः……हांऽऽअः…हांऽऽअः…ह्म्म… हांऽऽअः
हम दोनो की एक जैसी आवाजें निकल रही थी। काफ़ी देर ऐसे ही चलता रहा। बीच बीच में भाभी बड़बड़ाती रही- मज़ा आ रहा है ! करते रहो ! चूसो !
भाभी की चूत लगातार पानी छोड़ रही थी और मेरा लौड़ा बड़े आराम से अन्दर बाहर आ जा रहा था। भाभी भी अपने चूतड़ उठा उठा कर सहयोग कर रही थी। वो मदहोश हुई जा रही थी। उनके आनन्द का कोई पारावार ना था। ऐसा मज़ा शायद उन्हें पहले नहीं मिला था।
अब मैं चरमोत्कर्ष तक पहुंचने वाला था। मैंने भाभी को कहा - ले प्रीति ! ले ले मेरा सारा रस ! पिला दे अपनी चूत को !
"हां ! भर दे मेरी चूत अपने रस से मेरे मोनू भैया ! " भाभी बोली।
और मैंने पूरे जोर से आखिरी धक्का दिया तो मेर लन्ड भाभी के गर्भाशय तक पहुंच गया शायद और वो चीख पड़ी- मार डालेगा क्या?
मेरे मुंह से निकला- बस हो गया ! मेरा लन्ड भाभी की चूत में पिचकारियां मार रहा था। भाभी भी चरम सीमा प्राप्त कर चुकी थी। फ़िर कुछ रुक रुक कर हल्के हल्के झटके मार कर मैं भाभी के ऊपर ही लेटा रहा। हम दोनों अर्धमूर्छित से पड़े रहे काफ़ी देर। पता नहीं कब नींद भी आ गई।
जब मेरी नींद खुली तो देखा कि भाभी उसी तरह नंगी मेरी बगल में बेसुध हो कर सो रही थी। उनके मुख पर असीम तृप्ति का आभास हो रहा था। उनके लबों पर बहुत हल्की सी मुस्कान भी दिख रही थी। मैं धीरे से उठा और रसोई में जाकर दो कप चाय बना कर लाया तो देखा भाभी वैसे ही सो रही थी। मैं उनके पास गया और उनके लबों को हल्के से चूम लिया। जैसे ही मेरे होंठ ने उनके होंठों को स्पर्श किया, भाभी ने आंखें खोल दी और मुस्कुरा कर मेरी आंखों में झांकने लगी।
मैंने भाभी से कहा- "तो सोने का बहाना कर रही थी आप?"
भाभी बोली- मैं तो तभी जाग गई थी जब तुम यहां से उठ कर गए थे, लाओ अब चाय तो पिला दो जो प्यार से बना के लाए हो।
हमने चाय पी। तब तक रात के आठ बज चुके थे। मैंने भाभी से पूछा - कैसा लगा?
भाभी ने शरमा कर नज़रें झुका ली, कुछ बोली नहीं।
मैंने उनकी ठोडी पकड़ कर उनका चेहरा ऊपर को उठाया और फ़िर पूछा कि कैसा लगा आज मेरे साथ।
भाभी शर्मिली मुस्कान के साथ बोली- बहुत मज़ा आया, मज़ा तो तुम्हारे भैया के साथ भी बहुत आता है, पर तुम्हारे अन्दर नया जोश है
"पहले ऐसा ही मज़ा आता था भैया के साथ?" मैंने पूछा।
" सच कहूं तो ऐसा मज़ा मुझे कभी नहीं आया, मुझे तो पता भी नहीं था कि इतना मज़ा भी आता होगा चुदाई में" भाभी ने कहा। भाभी के मुंह से चुदाई शब्द सुन कर मैं अवाक रह गया। फ़िर मैंने भाभी से कहा- भाभी ! मैंने आपको इतना आनन्द दिया है, मुझे ईनाम मिलना चाहिए
" हां ! ईनाम के हकदार तो तुम हो। बोलो क्या चाहिए तुम्हें ईनाम में?" भाभी ने पूछा।
"मैं तो ऐसे ही कह रहा हूं, आप मिल गई, मुझे तो मेरा ईनाम मिल गया" मैंने कहा।
" नहीं, फ़िर भी मैं तुम्हें कुछ ना कुछ ईनाम जरूर दूंगी" भाभी ने कहा।
" जैसी आपकी मरजी ! अगर मैंने अपनी तरफ़ से कुछ मांग लिया तो देना पड़ेगा भाभी ! " मैंने कहा।
" हां हां जरूर ! मेरे बस में हुआ तो जरूर दूंगी" भाभी ने आश्वासन दिया।
" अच्छा अब बताओ रात के खाने में क्या बनाऊं? " प्रीति भाभी ने पूछा।
"अब क्या बनाओगी, मैं बाज़ार से ले आता हूं कुछ, वैसे भी मैं अभी सारी रात बाकी है। आप मुझे खाना, मैं आपको खाऊंगा" मैंने भाभी को छेड़ा।
मैंने बाज़ार जाने के लिए उठते हुए कहा- भाभी ! मैं बाज़ार से खाना ले कर आता हूं। आप बस ऐसे ही नंगी रहना, कपड़े नहीं पहनना। भाभी भी मेरे साथ खड़ी हो गई यह कहते हुए कि दरवाजा भी तो बंद करना होगा। भाभी मेरे पीछे पीछे आईं और मुझे कहा देखो बाहर कोई है तो नहीं, मैं दरवाजा बंद कर लूं।
जब मैंने बाज़ार से आकर दरवाजे की घण्टी बजाई और भाभी ने दरवाजा खोला तो वो वही नीला गाऊन पहने थी।
अन्दर आते आते मैंने पूछा कि गाऊन क्यों पहना?
तो कमरे में पहुंच कर भाभी बोली- आज तो बस बच गई। अभी अभी थोड़ी देर पहले दरवाजे की घण्टी बजी थी और मैंने समझा तुम ही होगे और मैं बिना गाऊन पहने दरवाजा खोलने ही वाली थी कि मुझे पड़ोस वाली रितु की आवाज सुनाई दी। वो मुझे ही पुकार रही थी। मैंने दौड़ कर गाऊन पहना और फ़िर दरवाजा खोला।
क्या करने आई थी रितु? रितु वही जो चार पांच घर छोड़ कर रहती है, नमिता आन्टी की बेटी?
हां वही, तू तो सबको जानता है?
बड़ी मस्त चीज है वो, एक बार मिल जाए तो साली को चोद चोद कर चार छः बच्चों की मां बना दूं।
"तेरा बस चले तो तू सारी दुनिया की लड़कियों को चोद चोद कर मां बना दे" भाभी बोली।
"सारी दुनिया को नहीं तो भाभी आपको तो अब जरूर मां बना दूंगा" मैंने कहा।
यह सुन कर भाभी भावुक हो उठी, उनकी आंखें गीली हो गई, वो बोली- तीन साल हो गए शादी को ! अब तक तो कोई आस बंधी नहीं, पता नहीं कब मैं मां का शब्द सुनूंगी अपने लिए। और तुम क्या सोचते हो कि मैंने ये सारी रासलीला तुम्हारे साथ शारीरिक आनन्द के लिए रचाई है? यह सब मैंने औलाद का सुख पाने के लिए किया है। भाभी रोती जा रही थी और बोलती जा रही थी-" वैसे तो तुम्हारे भैया में कोई कमी नहीं है, वो मुझे सहवास का पूरा पूरा मज़ा देते हैं, पर पता नहीं क्यों मैं गर्भवती क्यों नहीं हो रही। अब देखो तुम क्या गुल खिलाते हो? इतना कह कर भाभी के चेहरे पर कुछ मुस्कुराहट आई।
मैंने आगे बढ कर भाभी को अपनी बाहों में भर लिया और कहा- भगवान ने चाहा तो अगले साल तक मैं चाचाऽऽ… नहीं आपके बच्चे का पापाऽऽ… नहीं बस चाचा … हां … चाचा ही ठीक है, बन जाऊंगा।
अगर ऐसा हो गया तो मैं तुम्हें मुंह मांगा ईनाम दूंगी- भाभी ने भरे गले से कहा।
तो अब दो ईनाम हो गये- एक तो आपने चाय पीते हुए वायदा किया था आज ही और दूसरा अब जो अगले साल या उससे भी पहले मिल सकता है।
बाकी की कहानी अगले भाग में……mail me deepakjoshi34@yahoo.com

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हेलो दोस्तों मेरा नाम deepak है और मैं chootमें काम करता हूं, प्यार से मेरे दोस्त मुझे lunddav बुलाते है। मैं अंतरवासना की कहानी बड़े दिनों से पढ़ रहा हूं तो मैंने सोचा आज मैं अपनी रियल कहानी आपको सुनाऊँ........तो कहानी क़रीब १ साल पहले की है। मेरे घर में मैं माँ और पिताजी ही थे। मेरी उमर उस समय २५ साल की थी मेरा लंड ७.५ लंबा और २.५ इंच मोटा है लेकिन मुझे सेक्स का कोई अनुभव नहीं था। हाँ, मुठ मार लेता था। मैं इंजीनियरिंग कर चुका था और अभी नौकरी के लिए प्रयत्न कर रहा था।
एक दिन सुबह ७ :०० बजे मैं जब उठा और बाथरूम जा रहा था कि घर की दरवाजे की घंटी बजी। खोल के देखा तो मेरी मौसी का लड़का रमेश और उसकी बीवी रचना आए हैं। माँ ने तुरंत देखा और कहा आओ आओ दोनों ने अपना समान अन्दर रखा और माँ को प्रणाम किया थोड़ी देर कुछ बात करने के बाद भाभी तुरंत किचन में माँ के साथ काम करने लगी पिताजी बाथरूम से निकले और कपड़े पहन कर काम पर जाने के लिए तैयार हो गए, तब रमेश और भाभी ने पिताजी को भी प्रणाम किया सबने मिल कर नाश्ता किया। फ़िर रमेश ने कहा कि गाँव में उसका कोई काम नहीं चल रहा है और घर की हालत ख़राब होती जा रही है इसलिए मौसी ने कहा है कि शहर में जाकर कोई काम ढूंढो। जब तक रहने का इंतज़ाम नही होता तब तक यहाँ रुकेंगे। अगर माँ पिताजी चाहे तो। माँ पिताजी दोनों ने कहा कोई बात नही। हमारा घर बड़ा है। एक कमरा उन्हें दे दिया मेरे बाजू वाला और कहा पहले नौकरी देखो बाद में घर दूंढ लेना नाश्ता करने के बाद रमेश भी फ्रेश होकर नौकरी की तलाश में निकल गया।
रमेश के जाने के बाद भाभी माँ के साथ घर के काम में लग गई मैं स्नान करने बाथरूम में गया और तैयार होकर बाहर आया। भाभी मेरे साथ थोड़ी देर बैठ कर बातें करने लगी। थोड़ी देर में हमारी अच्छी दोस्ती हो गई। भाभी का रंग गोरा था और चूचियां एकदम कसी हुयी, पतली कमर गोल उभरी हुई गांड कुल मिलाकर भाभी एक चोदने की चीज़ थी। लेकिन अभी मेरे दिमाग में ऐसा कुछ नही आया। मुझसे बात करते हुए वो काम भी कर रही थी
शाम को रमेश वापस आया। उसे एक नौकरी मिल गई थी किसी लेथ मशीन पर वो लेथ मशीन का ओपेरटर था और उसकी तनख्वाह थी २०० रुपये रोज की। दो दिन ऐसे ही बीत गए। मैं उनके कमरे के बाजु वाले कमरे में ही सोता हूं। दोनो कमरों के बीच की दीवार ऊपर से खुली है। रात को दोनो के बीच झगड़ा होता था। भाभी की आवाज़ मैंने सुनी। तुम फ़िर से झड़ गए। मेरा तो कुछ हुआ ही नहीं। फ़िर से करो न, लेकिन रमेश कहता था तेरी चूत कोई घोड़ा भी चोदेगा तो ठंडी नही होगी। मुझे सोने दे। ऐसा दो रात हुआ। भाभी उठ कर बाथरूम जाती थी फ़िर बड़बढ़ाते हुए वापस आ कर सो जाती थी। भैय्या कहते थे "तू बहुत चुदासी है, तुझे संतुष्ट करना मुश्किल है, ख़ुद ही अपने हाथ से आग बुझा ले"।
तीसरे दिन, पापा और रमेश नाश्ता करके अपने काम पर चले गए मैं लेटा था। भाभी मेरे कमरे में आई और कहा कि नाश्ता करने चलो। माँ शायद बाथरूम में थी। मैंने किचन में जाकर नाश्ता करना शुरू किया। भाभी मेरे एकदम से क़रीब आई और बड़े प्यार से बोली संजय। एक बात पूंछू? मैंने कहा "पूछो" भाभी बोली "किसी से बताओगे तो नहीं?" मैंने पूछा ऐसी कौन सी बात है? और आप तो जानती हो मैं चुगली नही करता। भाभी फिर से बोली मैं जानती हूं लेकिन आप प्रोमिस दो आप किसी को नहीं बताएँगे मैंने कहा हाँ मैं प्रोमिस देता हूं। तब भाभी ने धीरे से कहा मेरे और तुम्हारे भैय्या के लिए कोक शास्त्र ला दो।, मैंने पूछा "क्यों?" भाभी ने कहा तुम्हारे भाई को औरत की कैसे चुदाई की जाती है वो सीखना पड़ेगा वो मुझे संतुष्ट नहीं कर पाता। मैंने कहा ठीक है मैं ला दूंगा
मैं सुबह मार्केट में गया और एक बुक स्टोर से अच्छा कोक शास्त्र और दो चुदाई की कहानी की पुस्तक ले आया। घर आकर मैंने चुदाई की पुस्तकें पढ़ी। मेरा लंड खड़ा हो गया। मैंने मुठ मारी और पहली बार मुझे भाभी को चोदने का ख़्याल आया। कोक शास्त्र में चुदाई की कई तस्वीरें थी। फ़िर मैंने भाभी को तीनो पुस्तकें दे दोपहर का खाना खाने के बाद भाभी वो पुस्तकें ले कर अपने कमरे में चली गई। पुस्तक पढ़ते हुये वो गरम हो गई। मैंने दरवाजे से देखा वो अपने चूत में हाथ डाल के मसल रही थी।
रात को डिनर के बाद १० :३० बजे सब अपने बेडरूम में सोने गए मैं ड्राइंग रूम में बैठ कर भाभी और रमेश भाई जो बात कर रहे थे वो सुन रहा था, रमेश ने भाभी की चुदाई की लेकिन उसे संतुष्ट नही कर सका और रोज की तरह जल्दी ही झड़ गया। भाभी उसे समझाने की कोशिश कर रही थी लेकिन वो सुनता ही नहीं था उसने कहा मुझसे फालतू बात मत कर तू कभी भी संतुष्ट नहीं होगी, आखिर में भाभी रूम से बाहर निकली और बाथरूम में गयी, बाथरूम से जब वापस आयी तब मैंने भाभी को रोका और भाभी का एक हाथ पकड़ के मेरे गरम लंड पर रख दिया, भाभी में मेरे लंड पर प्यार से हाथ फेरा और बोली ये तो बहुत बड़ा लंड है। मैंने कहा जब लंड बड़ा और मज़बूत होगा तभी ज्यादा मजा भी आयेगा।। भाभी बोली लगता है यही सच है लेकिन ये तो मेरी चूत फाड़ देगा
भाभी ने कहा आप मुठ मत मारना संजू भाई मैं रमेश के सोने के बाद तुमसे चुदाने आऊंगी, ये कह कर मेरे लंड को दबा के वो अपने रूम में चली गई, जाते ही रमेश बोला यह दूध में शक्कर डाला ही नहीं है जा के शक्कर मिला के लाओ। भाभी बिना कुछ कहे वो दूध ले के बाहर आयी और मुझे इशारे से किचन में बुलाया। मै उनके पीछे किचन में गया, भाभी धीरे से बोली कोई नींद की गोली है? मैंने कहा बहुत सी हैं , मम्मी पहले लेती थी, मैंने दो गोली निकाल के दी भाभी ने दोनो गोली पीस के दूध में डाली और शक्कर डाली फिर चम्मच से हिला के दूध तैयार किया, फिर वो बोली मुझे तुम्हारा लंड दिखाओ मैंने पाजामे से लंड बाहर निकला और भाभी के हाथ में दिया। भाभी उसे देख कर हैरान हो गई और बोली बाप रे इतना लंबा और इतना मोटा कितना सलोना और तगड़ा है आज मुझे इस लंड से चुदाना ही है। तुम आज मेरी चूत फाड़ दोगे। मेरा ७.५ इंच लंबा और २.५ इंच मोटा लंड उन्होंने हाथ में ले कर सहलाया if any women like fuking with me mail me on deepakjoshi34@yahoo.com

my sexy think story

******************** Start of story***********************
Hi am going to share my incest experiences with you all through iss. My name is Rahul and I have a younger sister, Reema. My parents both are working people and they used to live in Mumbai and we both in Pune. Me and Reema were taken care by our grandma, who never got up from her bed as she is very old and sick. She used to just shout at us, tell us some work and used to try to control me and my naughty sister Reema. When this actually happened Reema was around 17 yrs and I was 19. At the age of 17 yrs Reema was so hot n sexy with awesome structure of 34-28-34. She was young, naughty, sexy, hot and everything and she was for sure any man's destination, but she was not that aware of her beauty, as she was young. She was still playful with me and even I used to enjoy her beauty, by looking at her stiff boobs n thighs sometimes or whenever I got a chance. I also used to touch her wontedly without her notice like while playing games or so, but she wasn’t aware of that at all. T
he best part of all was sleeping with her. Yes, we used to sleep together in our parents room as our rooms had separate beds and my parents room had only single royal king size bed. So it became a habit for both of us to go into parents room at night without notice of our grandma as she used to always resist us from sleeping in our parents room and also used to tell us to sleep separate. But we never bothered, we used to the parents room after she slept and then sleep. Sometimes I used to hug her and would place my hands all over her body and sleep. l But as days passed I was feeling horny and hornier. I wanted to do more. So one night after my grandma went to sleep, usually Reema asked me to accompany her into the parents room. But I said I am not going to come and asked her to leave. She initially said ok and left, but after 5 mins she came back and requested me to come to the room as she never slept alone. Then I said its boring sleeping with her, and I would come if we have some fun and entertainment. She asked me what kind of fun? Then I told her that I have an interesting idea. She asked me eagerly what was that, as she was always ready for such kind of things.

Then I took her into the room and then I told her to play cards with me. We were almost bored with all games and playing cards was the new game we just started like from a month and she don’t even know how to play them. So I asked to play cards with me and every time she loose she will strip of a cloth on her body and even I do if I lose. In the beginning she didn’t got the point and started playing and as she was poor in the game, I won always and she removed her top and pant. Now she was in her bra and panty. She was so sexy in those apparel, her boobs were round and bulgy, her waist was awesome with beautiful navel, and her thighs were soft and lean. I was horny and had an immediate hard on. Then she lost again this time she asked me is it ok if I see her nude as we both were brother-sister, but I said game is game. Then she striped everything for me, and her tender, newly sprouting breasts were hanging in front of my eyes and her pussy was soft and a bit hairy. Then I
told her that even I would strip off to make her feel comfortable and we both were nude on the bed.

She was holding her bare breasts with her hands and her legs tightly packed. Then she asked what next. I told her to get comfortable and we both slept together that night holding each other tightly and I caressed her boobs and tried to finger her pussy but she resisted, but it was wonderful and even she liked it. From the next day we started doing that daily. We used to wait for the night and go to the room strip off and sleep together, this happened for a week.

Now she was being more and more comfortable with me, but she wasn’t ready for sex. She allowed me to handle her but she didn’t allow me to kiss her nor fuck her. I was going mad day by day. One night I thought of doing the final thing, and usually we went into the room. And we got into the bed and striped off everything, we were hugging and almost at peak, suddenly, my grandma pulled off our blanket and found us naked. She screamed and screamed loudly, and we both immediately dressed ourselves and went into our room.

Next day morning my grandma called me to her room. I asked Reema to come with me as I was scared that what grandma is going to do. So Reema was standing outside the door jus to listen what’s going on. And I went into the room. My grandma seeing at me, started crying and said, that what I did was wrong. I told her that I didn’t do anything then she said me some secrets which astonished me. She said that it was common feeling for any boy of my age to get sexually attracted to siblings, and it was the same happened with my dad. She told me that even my dad used to do sex with his sister when he was young and also she told me that she herself was been fucked by her own brother. I was shocked to listen all these stories and also Reema was shocked. Then she told me that it was against god and tradition to have sex with siblings. And also told me that even my dad had sex with his sis she is living his own life now and also even her brother fucked her she again got married to my
grandpa. So finally she told that whatever attraction is there that is temporary and we both will have our own lives after some years.
Then I came outside and asked Reema did she heard, then she replied yes. Even she was shocked. But I was not going to give up. So the same night I planned to fuck my sister.

That night again we went to the room. I told her Reema that we r going to do sex today. She said no. Then I told her that everyone would do this like our dad and grandma, they were close to their siblings so they did that and now they are living their own life, then why grandma wants to stay us separate. She then thought for a while and said yes. Then I started kissing her and even she was very much energetic. We both removed our clothes. Then all of a sudden my grandma entered the room, she again started shouting, but we didn’t stop this time.

I pushed my grandma onto a chair and she was sick so she didn’t get up. She was watching and shouting at us. But I didn’t stop. Reema was on the bed and I was over Reema. I kissed her and licked her neck. Then I sucked her boobs hard, her long brown nipples made me much more horny. While sucking her boobs I was rubbing her clitoris with my hand and she was jerking my hard cock. My grand ma was crying saying please stop. But we didn’t. Then I went down towards her pussy and licked it properly. It was so nice that I was not ready to stop. Then I slid my two fingers into Reema’s pussy and gave two n fro motion, and Reema was moaning loud in pleasure. Then I speeded her legs wide and slowly inserted my dick into her pussy. She started screaming. And I was now fucking her hard. My grandma was still crying and asking me to stop. I didn’t give up, my thrusts made my sister scream. She was on the top of the world and also me. I was fucking her vigorously, and after sometime
I made her kneel and inserted my penis into her pussy from backside, and then fucked her in doggy style. My grandma was shouting that the girl I am screwing is my own sister and god will curse me for that. I asked her to stop and also Reema shouted at her to get out as Reema was having real fun.

Then after fucking Reema for half an hour and also listening to my grandmas screams, I was bored and I didn’t cum yet, so wanted to try something more. And asked Reema to turn around again in doggy position. She did, and I speeded her legs and inserted my finger into her anus. She moaned. I applied some Vaseline to her anus and tried to push my thumb finger into her anus. She was pushing her face into the pillow for this effect. After few mins her anus sucked my thumb and was now juicy and ready for a fuck. Then I inserted my still hard huge penis into her anus slowly, and tried to push it inside slowly, Reema was screaming loudly. My grandma was also shouting at me saying that she is a little girl and not to spoil her and she was not ready for all this. But I didn’t care for her words. I pushed my dick as hard as I can and started jerking. I fucked her anus hard and after sometimes I was about to cum. And I told my grandma that I am going to stop and this the last treatm
ent for Reema, saying this I pushed my penis into Reema’s mouth, and bang!!! I cummed inside Reema’s mouth and she immediately swallowed everything.

My grandma said that she would tell my dad about this. Then I blackmailed her saying that I would tell my dad that she told me about his incest. Then my grandma was shocked at my threat. She said that she would keep quiet if this is the last time. I said no and told her that I would
d fuck Reema till am alive. And even Reema told that she liked it with me. Then my grandma went out. Then we both had some more sessions of hardcore sex till the morning. And in the morning when I and Reema came out, my grandma was still waiting for us. Then she told that she was just taking care that no one would come and know about this. I said that it was going what she did and from that day my grandma takes care of not letting this news to anyone and also help Reema help in sex issues like when I go wild Reema finds it difficult to resist my force so she takes tips from my grandma.
******************** End of story***********************
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मेरा नाम अमित है और मैं दिल्ली में रहता हूँ। मेरी उमर २० साल की है और मेरा मन भी सेक्स करने को करता है। और मै जब भी लड़की या औरत को देखता हूँ मेरा मन करता है कि मैं उसी वक्त उसे चोद दूँ।
मैं बहुत दिनों से चूत की तलाश में था कि एक दिन मैं अपने इंग्लिश के ट्यूशन में क्लास ले रहा था, तभी एक नई लड़की ने हमारे ट्यूशन में दाखिला लिया और वो रोज़ हमारे ग्रुप में मेरे पास बैठने लगी और हम ऐसे ही विषय में बात किया करते थे।
एक दिन हमारी बात बढ़ी और और हमारी दोस्ती प्यार में बदल गई और हम डेट पर जाने लगे। एक दिन हम होटल में खाना खा रहे थे तभी जोर की बारिश शुरू हो गई और वो बारिश मेरी जिन्दगी की सबसे हसीन बारिश बन गई। बारिश जोर से हो रही थी तभी मेरी गर्लफ्रेंड रिचा ने मुझसे कहा- हम घर कैसे जायेंगे?
तो मैंने कहा कि जब तक बारिश ख़त्म नहीं होती तब तक हमे इसी होटल में रहना होगा। मैंने एक कमरा किराये पर ले लिया और हम दोनों कमरे में चले गए और बातें करने लगे।
तभी जोर की विजली कड़की और रिचा मेरे गले से लग गई। मैंने जैसे ही गले से लगाया मेरा लंड खड़ा हो गया और मैंने उसे अपनी बाहों में भर लिया।
वो मुझ से कहने लगी- तुम ये क्या कर रहे हो?
मैंने उसकी एक ना सुनी और मैं अपने काम में मस्त था। और धीरे - धीरे मैंने उसके कपड़े उतारने शुरू कर दिए। उसने थोड़ा बहुत मना किया पर ऐसी ठण्ड में वो कब तक रूकती, उसने बोलना बंद कर दिया और मेरा साथ देने लगी।
मै पूरे जोश में आने लगा और मैंने अपने और उसके कपड़े उतार फेंके और शुरू हो गई हमारी मस्ती।
मैंने उसकी चूत को पहले तो खूब मुँह से पिया और तब तक पीता रहा जब तक उसने पानी नही छोड़ा और उसके बाद मैंने अपना लंड उसकी चूत पे रख के धक्का मारने लगा। वो बहुत जोर से चीखी और रोने लगी उसकी चूत में से खून भी आने लगा। तब मै समझ गया कि इसकी अब तक सील नही खुली थी लेकिन अब मैंने उससे कहा कि अब रोने से कोई फायदा नही, अब तुम्हें तो केवल मजा ही आएगा और वो चुप हो गई। मैं उसे चोदने लगा और बाद में मैंने उसकी गांड भी मारी। सुबह तक मैं और वो सोते हुए भी एक दूसरे से चिपके रहे और सुबह होते ही फ्रेश होकर कपड़े पहन कर अपने घर चले गए और उसके बाद मैंने उसे बहुत बार चोदा !
यह थी मेरी कहानी और जो भी मेरी कहानी पढ़े और उसे अच्छी लगे तो प्लीज़ मुझे मेल करे deepakjoshi34@yahoo.com or deepakjoshi8@in.com

Thursday, January 15, 2009

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वासना की कड़ियाँ / प्रेमचंद
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रचनाकार: प्रेमचंद


बहादुर, भाग्यशाली क़ासिम मुलतान की लड़ाई जीतकर घमंउ के नशे से चूर चला आता था। शाम हो गयी थी, लश्कर के लोग आरामगाह की तलाश मे नज़रें दौड़ाते थे, लेकिन क़ासिम को अपने नामदार मालिक की ख़िदमत में पहुंचन का शौक उड़ाये लिये आता था। उन तैयारियों का ख़याल करके जो उसके स्वागत के लिए दिल्ली में की गयी होंगी, उसका दिल उमंगो से भरपूर हो रहा था। सड़कें बन्दनवारों और झंडियों से सजी होंगी, चौराहों पर नौबतखाने अपना सुहाना राग अलापेंगे, ज्योंहि मैं सरे शहर के अन्दर दाखिल हूँगा। शहर में शोर मच जाएगा, तोपें अगवानी के लिए जोर-शोर से अपनी आवाजें बूलंद करेंगी। हवेलियों के झरोखों पर शहर की चांद जैसी सुन्दर स्त्रियां ऑखें गड़ाकर मुझे देखेंगी और मुझ पर फूलों की बारिश करेंगी। जड़ाऊ हौदों पर दरबार के लोग मेरी अगवानी को आयेंगे। इस शान से दीवाने खास तक जाने के बद जब मैं अपने हुजुर की ख़िदमत में पहुँचूँगा तो वह बॉँहे खोले हुए मुझे सीने से लगाने के लिए उठेंगे और मैं बड़े आदर से उनके पैरों को चूम लूंगा। आह, वह शुभ घड़ी कब आयेगी? क़ासिम मतवाला हो गया, उसने अपने चाव की बेसुधी में घोड़े को एड़ लगायी। कासिम लश्कर के पीछे था। घोड़ा एड़ लगाते ही आगे बढा, कैदियों का झुण्ड पीछे छूट गया। घायल सिपाहियों की डोलियां पीछे छूटीं, सवारों का दस्ता पीछे रहा। सवारों के आगे मुलतान के राजा की बेगमों और मैं उन्हें और शहजादियों की पनसें और सुखपाल थे। इन सवारियों के आगे-पीछे हथियारबन्द ख्व़ाजासराओं की एक बड़ी जमात थी। क़ासिम अपने रौ में घोड़ा बढाये चला आता था। यकायक उसे एक सजी हुई पालकी में से दो आंखें झांकती हुई नजर आयीं। क्रासिंग ठिठक गया, उसे मालूम हुआ कि मेरे हाथों के तोते उड़ गये, उसे अपने दिल में एक कंपकंपी, एक कमजोरी और बुद्धि पर एक उन्माद-सा अनुभव हुआ। उसका आसन खुद-ब-खुद ढ़ीला पड़ गया। तनी हुई गर्दन झुक गयी। नजरें नीची हुईं। वह दोनों आंखें दो चमकते और नाचते हुए सितारों की तरह, जिनमें जादू का-सा आकर्षण था, उसके आदिल के गोशे में बैठीं। वह जिधर ताकता था वहीं दोनों उमंग की रोशनी से चमकते हुए तारे नजर आते थे। उसे बर्छी नहीं लगी, कटार नहीं लगी, किसी ने उस पर जादू नहीं किया, मंतर नहीं किया, नहीं उसे अपने दिल में इस वक्त एक मजेदार बेसुधी, दर्द की एक लज्जत, मीठी-मीठी-सी एक कैफ्रियत और एक सुहानी चुभन से भरी हुई रोने की-सी हालत महसूस हो रही थी। उसका रोने को जी चाहता था, किसी दर्द की पुकार सुनकर शायद वह रो पड़ता, बेताब हो जाता। उसका दर्द का एहसास जाग उठा था जो इश्क की पहली मंजिल है। क्षण-भर बाद उसने हुक्म दिया—आज हमारा यहीं कयाम होगा।

आधी रात गुजर चुकी थी, लश्कर के आदमी मीटी नींद सो रहे थे। चारों तरफ़ मशालें जलती थीं और तिलासे के जवान जगह-जगह बैठे जम्हाइयां लेते थे। लेकिन क़ासिम की आंखों में नींद न थी। वह अपने लम्बे-चौड़े पुरलुत्फ़ ख़ेमे में बैठा हुआ सोच रहा था—क्या इस जवान औरत को एक नजर देख लेना कोई बड़ा गुनाह है? माना कि वह मुलतान के राजा की शहजादी है और मेरे बादशाह अपने हरम को उससे रोशन करना चाहते हैं लेकिन मेरी आरजू तो सिर्फ इतनी है कि उसे एक निगाह देख लूँ और वह भी इस तरह कि किसी को खबर न हो। बस। और मान लो यह गुनाह भी हो तो मैं इस वक्त वह गुनाह करूँगा। अभी हजारों बेगुनाहों को इन्हीं हाथों से क़त्ल कर आया हूँ। क्या खुदा के दरबार में गुनाहों की माफ़ी सिर्फ़ इसलिए हो जाएगी कि बादशाह के हुक्म से किये गये? कुछ भी हो, किसी नाज़नीन को एक नजर देख लेना किसी की जान लेने से बड़ा गुनाह नहीं। कम से कम मैं ऐसा नहीं समझता। क़ासिम दीनदार नौजवान था। वह देर तक इस काम के नैतिक पहलू पर ग़ौर करता रहा। मुलतान को फ़तेह करने वाला हीरो दूसरी बाधाओं को क्यों खयाल में लाता? उसने अपने खेमे से बाहर निकलकर देखा, बेगमों के खेमे थोड़ी ही दूर पर गड़े हुए थे। क़ासिम ने तजान-बूझकर अपना खेमा उसके पास लगाया था। इन खेमों के चारों तरफ़ कई मशालें जल रही थीं और पांच हब्शी ख्वाजासरा रंगी तलवारें लिये टहल रहे थे। कासिम आकर मसनद पर लेट गया और सोचने लगा—इन कम्बख्त़ों को क्या नींद न आयेगी? और चारों तरफ़ इतनी मशाले क्यों जला रक्खी हैं? इनका गुल होना जरूरी है। इसलिए पुकारा—मसरूर। -हुजुर, फ़रमाइए? -मशालें बुझा दो, मुझे नींद नहीं आती। -हुजूर, रात अंधेरी है। -हां। -जैसी हुजूर की मर्जी। ख्व़ाजासरा चला गया और एक पल में सब की सब मशालें गुल हो गयीं, अंधेरा छा गया। थोड़ी देर में एक औरत शहजादी के खेमे से निकलकर पूछा-मसरूम, सरकमार पूछती हैं, यह मशालें क्यों बुझा दी गयीं? मशरूम बोला-सिपहदार साहब की मर्जी। तुम लोग होशियार रहना, मुझे उनकी नियत साफ़ नहीं मालूम होती।

कासिम उत्सुकता से व्यग्र होकर कभी लेटता था, कभी उठ बैठता था, कभी टहलने लगता था। बार-बार दरवाजे पर आकर देखता, लेकिन पांचों ख्व़ाजासरा देंवों की तरह खडें नजर आते थे। क़ासिम को इस वक्त यही धुन थी कि शाहजादी का दर्शन क्योंकर हो। अंजाम की फ़िक्र, बदनामी का डर और शाही गुस्से का ख़तरा उस पुरज़ोर ख्वाहिश के नीचे दब गया था। घड़ियाल ने एक बजाया। क़ासिम यों चौकं पड़ा गोया कोई अनहोनी बात हो गयी। जैसे कचहरी में बैठा हुआ कोई फ़रियाद अपने नाम की पुकार सुनकर चौंक पड़ता है। ओ हो, तीन घंटों से सुबह हो जाएगी। खेमे उखड़ जाएगें। लश्कर कूच कर देगा। वक्त तंग है, अब देर करने की, हिचकचाने की गुंजाइश नहीं। कल दिल्ली पहुँच जायेंगे। आरमान दिल में क्यों रह जाये, किसी तरह इन हरामखोर ख्वाजासराओं को चकमा देना चाहिए। उसने बाहर निकल आवाज़ दी-मसरूर। --हुजूर, फ़रमाइए। --होशियार हो न? -हुजूर पलक तक नहीं झपकी। -नींद तो आती ही होगी, कैसी ठंड़ी हवा चल रही है। -जब हुजूर ही ने अभी तक आराम नहीं फ़रमाया तो गुलामों को क्योंकर नींद आती। -मै तुम्हें कुछ तकलीफ़ देना चाहता हूँ। -कहिए। -तुम्हारे साथ पांच आदमी है, उन्हें लेकर जरा एक बार लश्कर का चक्कर लगा आओ। देखो, लोग क्या कर रहे हैं। अक्सर सिपाही रात को जुआ खेलते हैं। बाज आस-पास के इलाक़ों में जाकर ख़रमस्ती किया करते हैं। जरा होशियारी से काम करना। मसरूर- मगर यहां मैदान खाली हो जाएगा। क़ासिम- मे तुम्हारे आने तक खबरदार रहूँगा। मसरूर- जो मर्जी हुजूर। क़ासिम- मैने तुम्हें मोतबर समझकर यह ख़िदमत सुपुर्द की है, इसका मुआवजा इंशाअल्ला तुम्हें साकर से अता होगा। मसरूम ने दबी ज़बान से कहा-बन्दा आपकी यह चालें सब समझता है। इंशाअल्ला सरकार से आपको भी इसका इनाम मिलेगा। और तब जोर बोला-आपकी बड़ी मेहरबानी है। एक लम्हें में पॉँचों ख्वाजासरा लश्कर की तरफ़ चले। क़ासिम ने उन्हें जाते देखा। मैदान साफ़ हो गया। अब वह बेधड़क खेमें में जा सकता था। लेकिन अब क़ासिम को मालूम हुआ कि अन्दर जाना इतना आसान नहीं है जितना वह समझा था। गुनाह का पहलू उसकी नजर से ओझल हो गया था। अब सिर्फ ज़ाहिरी मुश्किलों पर निगाह थी।

क़ासिम दबे पांव शहज़ादी के खेमे के पास आया, हालांकि दबे पांव आने की जरूरत न थी। उस सन्नाटे में वह दौड़ता हुआ चलता तो भी किसी को खबर न होती। उसने ख़ेमे से कान लगाकर सुना, किसी की आहट न मिली। इत्मीनान हो गया। तब उसने कमर से चाकू निकाला और कांपते हुए हाथों से खेमे की दो-तीन रस्सियां काट डालीं। अन्दर जाने का रास्ता निकल आया। उसने अन्दर की तरफ़ झांका। एक दीपक जल रहा था। दो बांदियां फ़र्श पर लेटी हुई थीं और शहज़ादी एक मख़मली गद्दे पर सो रही थी। क़ासिम की हिम्मत बढ़ी। वह सरककर अन्दर चला गया, और दबे पांव शहजादी के क़रीब जाकर उसके दिल-फ़रेब हुस्न का अमृत पीने लगा। उसे अब वह भय न था जो ख़ेमे में आते वक्त हुआ था। उसने जरूरत पड़ने पर अपनी भागने की राह सोच ली थी। क़ासिम एक मिनट तक मूरत की तरह खड़ा शहजादी को देखता रहा। काली-काली लटें खुलकर उसके गालों को छिपाये हुए थी। गोया काले-काले अक्षरों में एक चमकता हुआ शायराना खयाल छिपा हुआ था। मिट्टी की अस दुनिया में यह मजा, यह घुलावट, वह दीप्ति कहां? कासिम की आंखें इस दृश्य के नशे में चूर हो गयीं। उसके दिल पर एक उमंग बढाने वाला उन्माद सा छा गया, जो नतीजों से नहीं डरता था। उत्कण्ठा ने इच्छा का रूप धारण किया। उत्कण्ठा में अधिरता थी और आवेश, इच्छा में एक उन्माद और पीड़ा का आनन्द। उसके दिल में इस सुन्दरी के पैरों पर सर मलने की, उसके सामने रोने की, उसके क़दमों पर जान दे देने की, प्रेम का निवेदन करने की , अपने गम का बयान करने की एक लहर-सी उठने लगी वह वासना के भवंर मे पड़ गया।

क़ासिम आध घंटे तक उस रूप की रानी के पैरो के पास सर झुकाये सोचता रहा कि उसे कैसे जगाऊँ। ज्यों ही वह करवट बदलती वह ड़र के मारे थरथरा जाता। वह बहादुरी जिसने मुलतान को जीता था, उसका साथ छोड़े देती थी। एकाएक कसिम की निगाह एक सुनहरे गुलाबपोश पर पड़ी जो करीब ही एक चौकी पर रखा हुआ था। उसने गुलाबपोश उठा लिया और खड़ा सोचता रहा कि शहज़ादी को जगाऊँ या न जगाऊँ या न जगाउँ? सेने की डली पड़ी हुई देखकर हमं उसके उठाने में आगा-पीछा होता है, वही इस वक्त उसे हो रहा था। आखिरकार उसने कलेजा मजबूत करके शहजादी के कान्तिमान मुखमंण्डल पर गुलाब के कई छींटे दिये। दीपक मोतियों की लड़ी से सज उठा। शहज़ादी ने चौंकर आंखें खोलीं और क़ासिम को सामने खड़ा देखकर फौरन मुंह पर नक़ाब खींच लिया और धीरे से बोली-मसरूर। क़ासिम ने कहा-मसरूर तो यहां नही है, लेकिन मुझे अपना एक अदना जांबाज़ ख़ादिम समझिए। जो हुक्त होगा उसकी तामील में बाल बराबर उज्र न होगा। शहज़ादी ने नक़ाब और खींच लिया और ख़ेमे के एक कोने में जाकर खड़ी हो गयी। क़ासिम को अपनी वाक्-शक्ति का आज पहली बार अनुभव हुआ। वह बहुत कम बोलने वाला और गम्भीर आदमी था। अपने हृउय के भावों को प्रकट करने में उसे हमेशा झिझक होती थी लेकिन इस वक्त़ शब्द बारिश की बूंदो की तरह उसकी जबान पर आने लगे। गहरे पानी के बहाव में एक दर्द का स्वर पैदा हो जाता है। बोला-मैं जानता हूँ कि मेरी यह गुस्ताखी आपकी नाजुक तबियत पर नागवार गुज़री है। हुजूर, इसकी जो सजा मुनाशिब समझें उसके लिए यह सर झुका हुआ है। आह, मै ही वह बदनसीब, काले दिल का इंसान हूँ जिसने आपके बुजुर्ग बाप और प्यारे भाईंयों के खून से अपना दामन नापाक किया है। मेरे ही हाथों मुलतान के हजारो जवान मारे गये, सल्तनत तबाह हो गयी, शाही खानदान पर मुसीबत आयी और आपको यह स्याह दिन देखना पडा। लेकिन इस वक्त़ आपका यह मुजरिम आपके सामने हाथ बांधे हाज़िर है। आपके एक इशारे पर वह आपके कदमों पर न्योठावर हो जायेगा और उसकी नापाक जिन्दगी से दुनिया पाक हो जायेगी। मुझे आज मालूम हुआ कि बहादुरी के परदे में वासना आदमी से कैसे-कैसे पाप करवाती है। यह महज लालच की आग है, राख में छिपी हुईं सिर्फ़ एक कातिल जहर है, खुशनुमा शीशे में बन्द! काश मेरी आंखें पहले खुली होतीं तो एक नामवर शाही ख़ानदान यों खाक में न मिल जाता। पर इस मुहब्बत की शमा ने, जो कल शाम को मेरे सीने में रोशन हुई, इस अंधेरे कोने को रोशनी से भर दिया। यह उन रूहानी जज्ब़ात का फैज है, जो कल मेरे दिल में जाग उठे, जिन्होंने मुझे लाजच की कैद से आज़ाद कर दिया। इसके बाद क़ासिम ने अपनी बेक़रारी और दर्दे दिल और वियोग की पीड़ा का बहुत ही करूण शदों में वर्णन किया, यहां तक कि उसके शब्दों का भण्डार खत्म हो गया। अपना हाल कह सुनाने की लालसा पूरी हो गयी।

लेकिन वह वासना बन्दी वहां से हिला नहीं। उसकी आरजुओं ने एक कदम और आगे बढाया। मेरी इस रामकहानी का हासिल क्या? अगर सिर्फ़ दर्दे दिल ही सुनाना था, तो किसी तसवीर को, सुना सकता था। वह तसवीर इससे ज्यादा ध्यान से और ख़ामाशी से मेरे ग़म की दास्तान सुनती। काश, मैं भी इस रूप की रानी की मिठी आवाज सुनता, वह भी मुझसे कुछ अपने दिल का हाल कहती, मुझे मालूम होता कि मेरे इस दर्द के किस्से का उसके दिल पर क्या असर हुआ। काश, मुझे मालूत होता कि जिस आग में मैं फुंका जा रहा हूँ, कुछ उसकी आंच उधर भी पहुँचती है या नहीं। कौन जाने यह सच हो कि मुहब्बत पहले माशूक के दिल में पैदा होती है। ऐसा न होता तो वह सब्र को तोड़ने वाली निगाह मुझ पर पड़ती ही क्यों? आह, इस हुस्न की देवी की बातों में कितना लुत्फ़ आयेगा। बुलबुल का गाना सुन सकता, उसकी आवाज कितनी दिलकश होगी, कितनी पाकीजा, कितनी नूरानी, अमृत में डूबीं हुई और जो कहीं वह भी मुझसे प्यार करती हो तो फिर मुझसे ज्यादा खुशनसीब दुनिया में और कौन होगा? इस ख़याल से क़ासिम का दिल उछलने लगा। रगों में एक हरकत-सी महसूस हुई। इसके बावजूद कि बांदियों के जग जाने और मसरूर की वापसी का धड़का लगा हुआ था, आपसी बातचीत की इच्छा ने उसे अधीर कर दिया, बोला-हुस्न की मलका, यह जख्म़ी दिल आपकी इनायत की नज़र की मुस्तहक है। कुड़ उसके हाल पर रहम न कीजिएगा? शहज़ादी ने नकाब की ओट से उसकी तरफ़ ताका और बोली–जो खुद रहम का मुस्तहक हो, वह दूसरों के साथ क्या रहम कर सकता है? क़ैद में तड़पते हुए पंछी से, जिसके न बोल हैं न पर, गाने की उम्मीद रखना बेकार है। मैं जानती हूँ कि कल शाम को दिल्ली के ज़ालिम बादशाह के सामने बांदियों की तरह हाथ बांधे खड़ी हूंगी। मेरी इज्जत, मेरे रूतबे और मेरी शान का दारोमदार खानदानी इज्जत पर नहीं बल्कि मेरी सूरत पर होगा। नसीब का हक पूरा हा जायेगा। कौन ऐसा आदमी है जो इस जिन्दगी की आरजू रक्खेगा? आह, मुल्तान की शहजादी आज एक जालिम, चालबाज, पापी आदमी की वासना का शिकार बनने पर मजबूर है। जाइए, मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिए। मैं बदनसीब हूँ, ऐसा न हो कि मेरे साथ आपको भी शाही गुस्से का शिकार बनना पड़े। दिल मे कितनी ही बातें है मगर क्यों कहूँ, क्या हासिल? इस भेद का भेद बना रहना ही अच्छा है। आपमें सच्ची बहादुरी और खुद्दारी है। आप दुनिया में अपना नाम पैदा करेंगे, बड़े-बड़े काम करेगें, खुदा आपके इरादों में बरकत दे–यही इस आफ़प की मारी हुई औरत की दुआ है। मैं सच्चे दिल से कहती हूँ कि मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं है। आज मुझे मालूम हुआ कि मुहब्बत बैर से कितनी पाक होती है। वह उस दामन में मुंह छिपाने से भी परहेज नहीं करती जो उसके अजीजों के खून से लिथड़ा हुआ हो। आह, यह कम्बख्त दिल उबला पड़ता है। अपने काल बन्द कर लीजिए, वह अपने आपे में नहीं है, उसकी बातें न सुनिए। सिर्फ़ आपसे यही बिनती है कि इस ग़रीब को भूल न जाइएगा। मेरे दिल में उस मीठे सपने की याद हमेशा ताजा रहेगी, हरम की क़ैद में यही सपना दिल को तसकीन देता रहेगा, इस सपने को तोड़िए मत। अब खुदा के वास्ते यहां से जाइए, ऐसा न हो कि मसरूर आ जाए, वह एक ज़ालिम है। मुझे अंदेशा है कि उसने आपको धोखा दिया, अजब नहीं कि यहीं कहीं छुपा बैठा हो, उससे होथियार रहिएगा। खुदा हाफ़िज!

क़ासिम पर एक बेसुधी की सी हालत छा गयी। जैसे आत्मा का गीत सुनने के बाद किसी योगी की होती है। उसे सपने में भी जो उम्मीद न हो सकती थी, वह पूरी हो गयी थी। गर्व से उसकी गर्दन की रगें तन गयीं, उसे मालूम हुआ कि दुनिया में मुझसे ज्यादा भाग्यशाली दूसरा नहीं है। मैं चाहूँ तो इस रूप की वाटिका की बहार लूट सकता हूँ, इस प्याले से मस्त हो सकता हूँ। आह वह कितनी नशीली, कितनी मुबारक जिन्दगी होती! अब तक क़ासिम की मुहब्बत ग्वाले का दूध थी, पानी से मिली हुई; शहज़ादी के दिल की तड़प ने पानी को जलाकर सच्चाई का रंग पैदा कर दिया। उसके दिल ने कहा-मैं इस रूप की रानी के लिए क्या कुछ नहीं कर सकता? कोई ऐसी मुसीबत नहीं है जो झेल न सकूँ, कोई आग नहीं, जिसमें कूद न सकूं, मुझे किसका डर है! बादशाह का? मैं बादशाह का गुलाम नहीं, उसके सामने हाथ फैलानेवाला नहीं, उसका मोहताज नहीं। मेरे जौहर की हर एक दरबार में कद्र हो सकती है। मैं आज इस गूलामी की जंजीर को तोड़ डालूँगा और उस देश में जा बसूँगा, जहां बादशाह के फ़रिश्ते भी पर नहीं मार सकते। हुस्न की नेमत पाकर अब मुझे और किसी चीज़ की इच्छा नहीं। अब अपनी आरजुओं का क्यों गला घोटूं? कामनाओं को क्यों निराशा का ग्रास बनने दूँ? उसने उन्माद की-सी स्थिति में कमर से तलवार निकाली और जोश के साथ बोला–जब तक मेरे बाजूओ में दम है, कोई आपकी तरफ़ आंख उठाकर देख भी नहीं सकता। चाहे वह दिल्ली का बादशाह ही क्यो ने हो! मैं दिल्ली के कूचे और बाजार में खून की नदी बहा दुंगा, सल्तनत की जड़े हिलाउ दुँगा, शाही तख्त को उल्ट-पलट रख दूँगा, और कुछ न कर सकूंगा तो मर मिटूंगा। पर अपनी आंखो से आपकी याह जिल्लत न देखूँगा। शहज़ादी आहिस्ता-आहिस्ता उसके क़रीब आयी बोली-मुझे आप पर पूरा भरोसा है, लेकिन आपको मेरी ख़ातिर से जब्त और सब्र करना होगा। आपके लिए मैं महलहरा की तकलीफ़ें और जुल्म सब सह लूंगी। आपकी मुहब्बत ही मेरी जिन्दगी का सहारा होगी। यह यक़ीन कि आप मुझे अपनी लौंडी समझते हैं, मुझे हमेशा सम्हालता रहेगा। कौन जाने तक़दीर हमें फिर मिलाये। क़ासिम ने अकड़कर कहा-आप दिल्ली जायें ही क्यों! हम सबुह होते-होते भरतपुर पहुँच सकते हैं। शहजादी–मगर हिन्दोस्तान के बाहर तो नहीं जा सकते। दिल्ली की आंख का कांटा बनकर मुमकिन है हम जंगलों और वीरानों में जिन्दगी के दिन काटें पर चैन नसीब न होगा। असलियत की तरफ से आंखे न बन्द की जिए, खुदा न आपकी बहादुरी दी है, पर तेगे इस्फ़हानी भी तो पहाड़ से टकराकर टुट ही जाएगी। कासिम का जोश कुछ धीमा हुआ। भ्रम का परदा नजरों से हट गया। कल्पना की दुनिया में बढ़-बढ़कर बातें करना बाते करना आदमी का गुण है। क़ासिम को अपनी बेबसी साफ़ दिखाई पड़ने लगी। बेशक मेरी यह लनतरानियां मज़ाक की चीज़ हैं। दिल्ली के शाह के मुक़ाबिलें में मेरी क्या हस्ती है? उनका एक इशारा मेरी हस्ती को मिटा सकता है। हसरत-भरे लहजे में बोला-मान लीजिए, हमको जंगलो और बीरानों में ही जिन्दगी के दिन काटने पड़ें तो क्या? मुहब्बत करनेवाले अंधेरे कोने में भी चमन की सैर का लुफ़्त उठाते हैं। मुहब्बत में वह फ़क़ीरों और दरवेशों जैसा अलगाव है, जो दुनिया की नेमतों की तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखता। शहज़ादी–मगर मुझ से यह कब मुमकिन है कि अपनी भलाई के लिए आपको इन खतरों में डालूँ? मै शाहे दिल्ली के जुल्मों की कहानियां सुन चुकी हूँ, उन्हें याद करके रोंगेटे खड़े हो जाते हैं। खुदा वह दिन न लाये कि मेरी वजह से आपका बाल भी बांका हो। आपकी लड़ाइयों के चर्चे, आपकी खैरियत की खबरे, उस क़ैद में मुझको तसकीन और ताक़त देंगी। मैं मुसीबते झेलूंगी और हंस–हंसकर आग में जलूँगी और माथे पर बल न आने दूँगी। हॉँ, मै शाहे दिल्ली के दिल को अपना बनाऊँगी, सिर्फ आपकी खातिर से ताकि आपके लिए मौक़ा पड़ने पर दो-चार अच्छी बातें कह सकूँ।

लेकिन क़ासिम अब भी वहां से न हिला। उसकर आरजूएं उम्मीद से बढ़कर पूरी होती जाती थीं, फिर हवस भी उसी अन्दाज से बढ़ती जाती थी। उसने सोचा अगर हमारी मुहब्बत की बहार सिर्फ़ कुछ लमहों की मेहमान है, तो फिर उन मुबारकबाद लमहों को आगे की चिन्ता से क्यों बेमज़ा करें। अगर तक़दीर में इस हुस्न की नेमत को पाना नहीं लिखा है, तो इस मौक़े को हाथ से क्यों जाने दूँ। कौन जाने फिर मुलाकात हो या न हो? यह मुहब्बत रहे या न रहें? बोला-शहज़ादी, अगर आपका यही आखिरी फ़ैसाल है, तो मेरे लिए सिवाय हसरत और मायूसी के और क्या चारा है? दूख होगा, कुढूंगा, पर सब्र करूंगा। अब एक दम के लिए यहां आकर मेरे पहलू में बैठ जाइए ताकि इस बेकरार दिल को तस्कीन हो। आइए, एक लमहे के लिए भूल जाएं कि जुदाई की घड़ी हमारे सर पर खड़ी है। कौन जाने यह दिन कब आयें? शान-शौकत ग़रीबों की याद भूला देती है, आइए एक घड़ी मिलकर बैठें। अपनी जल्फ़ो की अम्बरी खुशबू से इस जलती हुई रूह को तरावट पहुँचाइए। यह बांहें, गलो की जंजीरे बने जाएं। अपने बिल्लौर जैसे हाथों से प्रेम के प्याले भर-भरकर पिलाइए। साग़र के ऐसे दौर चलें कि हम छक जाएं! दिलो पर सुरूर को ऐसा गाढ़ा रंग चढ़े जिस पर जुदाई की तुर्शियों का असर न हो। वह रंगीन शराब पिलाइए जो इस झुलसी हुई आरजूओं की खेती को सींच दे और यह रूह की प्यास हमेशा के लिए बुझ जाए। मए अग़वानी के दौर चलने लगे। शहज़ादी की बिल्लौरी हथेली में सुर्ख शराब का प्याला ऐसा मालूम होता था जैसे पानी की बिल्लौरी सतह पर कमल का फूल खिला हो क़ासिम दीनो दुनिया से बेख़बर प्याले पर प्याले चढ़ाता जाता था जैसे कोई डाकू लूट के माल पर टूटा हुआ हो। यहां तक कि उसकी आंखे लाल हो गयीं, गर्दन झ़ुक गयी, पी-पीकर मदहोश हो गया। शहजादी की तरफ़ वसाना-भरी आंखो से ताकता हुआ। बाहें खोले बढा कि घड़ियाल ने चार बजाये और कूच के डंके की दिल छेद देनेवाली आवाजें कान में आयीं। बाँहें खुली की खुली रह गयीं। लौडियां उठ बैठी, शहजादी उठ खड़ी हुई और बदनसीब क़ासिम दिल की आरजुएं लिये खेमे से बाहर निकला, जैसे तक़दीर के फ़ैलादी पंजे ने उसे ढकेलकर बाहर निकाल दिया हो। जब अपने खेमे में आया तो दिल आरजूओं से भरा हुआ था। कुछ देर के बाद आरजुओं ने हवस का रूप भरा और अब बाहर निकला तो दिल हरसतों से पामाल था, हवस का मकड़ी-जाल उसकी रूह के लिए लोहे की जंजीरें बना हुआ था।

शाम का सुहाना वक़्त था। सुबह की ठण्डी-ठण्डी हवा से सागर में धीरे धीरे लहरें उठ रही थीं। बहादुर, क़िस्मत का धनी क़ासिम मुलतान के मोर्चे को सर करके गर्व की मादिरा पिये उसके नशे में चूर चला आता था। दिल्ली की सड़के बन्दनवारों और झंडियों से सजी हुई थीं। गुलाब और केवड़े की खुशब चारों तरफ उड़ रही थी। जगह-जगह नौबतखाने अपना सुहाना राग गया। तोपों ने अगवानी की घनगरज सदांए बुलन्द कीं। ऊपर झरोखों में नगर की सुन्दरियां सितारों की तरह चमकने लगीं। कासिम पर फूलों की बरखा होने लगी। वह शाही महल के क़रीब पहुँचार तो बड़े-बड़े अमीर-उमरा उसकी अगवानी के लिए क़तार बांधे खड़े थे। इस शान से वह दीवाने खास तक पहुँचा। उसका दिमाग इस वक्त सातवें आसमान पर था। चाव-भरी आंखों से ताकता हुआ बादशाह के पास पहुँचा और शाही तख्त को चूम लिया। बादशाह मुस्काराकर तख़्त से उतरे और बांहें खोले हुए क़ासिम को सीने से लगाने के लिए बढ़े। क़ासिम आदर से उनके पैरों को चूमने के लिए झुका कि यकायक उसके सिर पर एक बिजली-सी गिरी। बादशाह को तेज खंजर उसकी गर्दन पर पड़ा और सर तन से जुदा होकर अलग जा गिरा। खून के फ़ौवारे बादशाह के क़दमो की तरफ़, तख्त की तरफ़ और तख़्त के पीछे खड़े होने वाले मसरूर की तरफ़ लपके, गोया कोई झल्लाया हुआ आग का सांप है। घायल शरीर एक पल में ठंडा हो गया। मगर दोनों आंखे हसरत की मारी हुई दो मूरतों की तरह देर तक दीवारों की तरफ़ ताकती रहीं। आखिर वह भी बन्द हो गयीं। हवस ने अपना काम पूरा कर दिया। अब सिर्फ़ हसरत बाक़ी थी। जो बरसों तक दीवाने खास के दरोदीवार पर छायी रही और जिसकी झलक अभी तक क़ासिम के मज़ार पर घास-फूस की सूरत में नज़र आती है। -by deepakjoshi34@yahoo.com please mail me

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लडकी की चुदाई केसे करे
लडकी को चोदने से पहले उसे परख लेना जरूरी है। एक नई कुंवारी लडकी को चोदने मे बड़ी मुश्कील आती है। पर आप यदी कीसी शादी शुदा लडकी की चूत मारेगे तो बड़ा मज़ा आएगा । मे तो आपको यही सलाह दूंगा की कुवारी लकड़ी की तभी ले जब आप चोदने मे उस्ताद हो, नही तो आपको कई मुश्कीलो का सामना करना पढ़ सकताहै। जेसे लडकी की चूत की सील तोड़ना । उसको चूदने के लीए मनाना ।दूसरी तरफ यदी आप एक शादी शुदा की चूत लेगे तो वो अपको चुदाई करने मे मदद करेगी ओर यदी आप चोदने मे नोसीखीये हो तो वो आपको चोदने की तरकीब बताएगी । सबसे बड़ी बात की वो रोयेगी नही जो की एक नईलडकी मे अक्सर देखा गया है की वो चूद्वाने मे बहुत समय लेती है । अगर आपकी नई-नई शादी हुई है तो अलग बात है आप धीरे धीरे सब सीख जायेगे । मे आप को अपने दोस्त की बात बताता हू । वो अपनी Girl Friend को घुमाने ले गया ओर फीर उसको अपने दोस्त के घर ले गया जो खली पड़ा था । उसने बताया की आधे घंटे तक लडकी को मनाता ही रहा तब जाके उसे चूत के दीदार हुये ।
लडकी को चोदने के नीयम
सबसे पहले लडकी को चूमो । उसे लाल लाल होठ ओर गालो को चूमो । उसको गर्म करने के लीए उसको कान, गर्दन और क़मर पर कटे । चोदने की जल्द बाजी न करे । उसके चूचो को दबाये , उसके नीप्ल को हीलाये । उसकी जांघ पर बार बार हाथ फह्राये । इससे लडकी पूरी तरह गर्म हो जायेगी । तब अपने खुकार लंड का प्रयोग करे। यदी आपने जल्द बाजी करने की कोशीस की तो गम्भीर परीनाम हो सकते है। आप तो आपना माल झडा देगे पर यदी उसको संतुस्ती नही मीली तो वो आपको नही जाने देगी। यह आपके तलाक का कारन भी बनसकता है । इस्लीये अपनी बीवी या कीसी लडकी लो पूरा गर्म होने से पहले चोदने की गलती ना करे ।आप उपने साथी को पूरा गर्म करे ताकी उसकी sex power पुरे उफान पर हो ओर आपके दस बीस या तीस झटको से उसको संतुस्ती मील जाये । आप को भी संतुस्ती मील जायेगी ओर आपके साथी को भी। सबसे बड़ा सवाल यह है की आप को यह केसे पता लगेगा की लडकी को कब चोदना है । It is very simple जब लडकी के nipple या चूचुक Tite या सतर्क हो जाये तो समझ जाये की चोदने की शुरुवात कर देनी चाहिऐ।
चोदने के पोज
अगर आप आपनी बीवी की चुदायी कर रहे है तो एक आदर्श पाती की तरह काम करे । कई लोग मजे लेने केचक्कर मे उल्टे शीधे टेढ़े मधे पोज बनाकर चोदते है । जो की औरत की बच्चे दानी को खराब कर सकती है। ओर अगर आप कीसी रंडी ओर घस्ती की चोदने जा रहे है तो डील खोल कर चोदो । उल्टा करो, सीधा करो, दाये करो, बाये करो, ऊपर लटका कर लो, टांग फ़ला कर लो, उसके मुह मे अपना तीखा लंड लो कोई problem नही। आप चोदने के नए पुराने हर तरह के तरीके अपना सकते है।आप चाहे जैसे चोदो , लंड आपका , हमारा काम तो आपको बताना था । चोदन समीती की तरफ से लंड हीत मे जारी अपने लंड का सही उपयोग करे । गंदे गद्धो से बच कर रहे । नीरोध का इस्तेमाल करे ।yes if any women like this story then you can mail me on my mail deepakjoshi34@yahoo.com